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Hukamnama Sri Darbar Sahib अमृतसर
🪷🌸 Amrit Vele Da Hukamnama Sri Darbar Sahib | November | Date 04-11-2026 | Ang 845 आज का हुकमनामा
बिलावलु महला ५ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥ अबिनासी वरु सुणिआ मनि उपजिआ चाइआ राम ॥ मनि प्रीति लागै वडै भागै कब मिलीऐ पूरन पते ॥ सहजे समाईऐ गोविंदु पाईऐ देहु सखीए मोहि मते ॥ दिनु रैणि ठाढी करउ सेवा प्रभु कवन जुगती पाइआ ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा लैहु मोहि लड़ि लाइआ ॥१॥ भइआ समाहड़ा हरि रतनु विसाहा राम ॥ खोजी खोजि लधा हरि संतन पाहा राम ॥ मिले संत पिआरे दइआ धारे कथहि अकथ बीचारो ॥ इक चिति इक मनि धिआइ सुआमी लाइ प्रीति पिआरो ॥ कर जोड़ि प्रभ पहि करि बिनंती मिलै हरि जसु लाहा ॥
बिनवंति नानक दासु तेरा मेरा प्रभु अगम अथाहा ॥२॥ साहा अटलु गणिआ पूरन संजोगो राम ॥ सुखह समूह भइआ गइआ विजोगो राम ॥ मिलि संत आए प्रभ धिआए बणे अचरज जाञीआं ॥ मिलि इकत्र होए सहजि ढोए मनि प्रीति उपजी माञीआ ॥ मिलि जोति जोती ओति पोती हरि नामु सभि रस भोगो ॥ बिनवंति नानक सभ संति मेली प्रभु करण कारण जोगो ॥३॥ भवनु सुहावड़ा धरति सभागी राम ॥ प्रभु घरि आइअड़ा गुर चरणी लागी राम ॥ गुर चरण लागी सहजि जागी सगल इछा पुंनीआ ॥ मेरी आस पूरी संत धूरी हरि मिले कंत विछुंनिआ ॥ आनंद अनदिनु वजहि वाजे अहं मति मन की तिआगी ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी संतसंगि लिव लागी ॥४॥१॥
अर्थ: हे सहेलिए! प्यारे प्रभू की सिफत सालाह का गीत गाने से (मन में) खुशी का रंग-ढंग बन जाता है। उस कभी ना मरने वाले पति-प्रभू (का नाम) सुनने से मन में चाव पैदा हो जाता है। (जब) बहुत किस्मत से (किसी जीव-स्त्री के) मन में परमात्मा-पति का प्यार पैदा होता है, (तब वह उतावली हो-हो पड़ती है उस) सारे गुणों के मालिक प्रभू-पति को कब मिला जा सकेगा। (उसके आगे यह उक्तर मिलता है- अगर) आत्मिक अडोलता में लीन रहें तो परमात्मा पति मिल जाता है। (वह भाग्यशाली जीव-स्त्री बार-बार पूछती है-) हे सहेलिए! मुझे बुद्धि दे कि किस तरीके से प्रभू-पति मिल सकता है (हे सहेलिए! बता) मैं दिन-रात खड़ी हुई तेरी सेवा करूँगी। नानक (भी) विनती करता है- (हे प्रभू! मेरे ऊपर) मेहर कर, (मुझे अपने) पल्ले से लगाए रख।
1। हे भाई! (परमात्मा का नाम किमती रत्न है, जो मनुष्य यह) हरी-नाम का व्यापर करता है (उसके अंदर) धीरज पैदा हो जाता है। पर, ये नाम-रत्न (कोई दुर्लभ) खोज करने वाला मनुष्य तलाश करके संत-जनों से ही हासिल करता है। जिस भाग्यशाली मनुष्य को प्यारे संत-जन मिल जाते हैं, (वही) मेहर करके (उसको) अकथ प्रभू की सिफत सालाह की बातें सुनाते हैं। हे भाई! (संत-जनों की संगति में रह के) सुरति जोड़ के, मन लगा के प्रभू-चरणों से प्यार डाल के (परमात्मा का) नाम सिमरा कर। प्रभू के दर पर (दोनों) हाथ जोड़ के अरदास किया कर। (जो मनुष्य नित्य अरदास करता रहता है, उसको मानस जीवन की) कमाई (के तौर पर) परमात्मा की सिफत-सालाह (की दाति) मिलती है। हे अपहुँच और अथाह प्रभू! नानक (तेरे दर पर) विनती करता है- मैं तेरा दास हूँ, तू मेरा मालिक है (मुझे अपनी सिफत-सालाह की दाति बख्श)।2। (लडकी-लड़के के विवाह का महूरत निहित किया जाता है।
दूल्हे के साथ बाराती आते हैं, लड़की वालों के घर पहुँचते हैं, उस वक्त लड़की वालों सगे-संबन्धियों के मन में खुशी होती है। बारातियों को कई प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खिलाते हैं। पंडित लावें पढ़ के लड़की-लड़के का मेल करा देता है)। (इसी तरह साध-संगति की बरकति से जीव-स्त्री और प्रभू-पति के मिलाप का) कभी ना टलने वाला महूरत बन जाता है। (साध-संगति की कृपा से जीव-स्त्री का) पूरन-परमात्मा से मिलाप (विवाह) हो जाता है, (जीव-स्त्री के हृदय में) सारे सुख आ बसते हैं (प्रभू-पति से उसका) विछोड़ा (वियोग) मिट जाता है। संतजन मिल के (साध-संगति में) आते हैं, प्रभू की सिफत-सालाह करते हैं (जीव-स्त्री को प्रभू-पति को मिलाने के लिए ये सत्संगी) आश्चर्यजनक बाराती (जांजी) बन जाते हैं। (संतजन) मिल के (साध-संगति में) इकट्ठे होते हैं, आत्मिक अडोलता में (टिकते हैं, जैसे लड़की वालों के घर बाराती) पहुँच रहे होते हैं, (जैसे) लड़की वाले सगे-संबन्धियों के मन में उत्साह-खुशी पैदा होती है (वैसे ही प्राणों के साथियों के मन में, सारी ज्ञानेन्द्रियों के अंदर चाव पैदा होता है । (साध-संगति के प्रताप से जीव-स्त्री के) प्राण प्रभू की ज्यरेति में मिल के ओत-प्रोत एक-मेक हो जाते हैं (जैसे दोनों तरफ के बारातियों- जांजियों मांजियों – को) सारे स्वादिष्ट पदार्थ खिलाए जाते हैं, (वैसे ही जीव-स्त्री को) परमात्मा का नाम-भोजन प्राप्त होता है। नानक बिनती करता है- (यह सारी गुरू की ही मेहर है) गुरू संत ने (शरण पड़ी) सारी लुकाई को सारे जगत का मूल सब ताकतों का मालिक मिलाया है।
3। (जो जीव-स्त्री) गुरू के चरणों में लगती है, उसके (हृदय-) घर में प्रभू-पति आ बैठता है, उसका (शरीर-) भवन सुंदर हो जाता है, उसकी (हृदय-) धरती भाग्यशाली हो जाती है। (जो जीव-स्त्री) गुरू के चरणों में लगती है, वह आत्मिक अडोलता में (टिक के विकारों के हमलों से) सचेत रहती है, उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। साध-संगति की चरण-धूल के प्रताप से (उसके अंदर से) ममता बढ़ाने वाली आस खत्म हो जाती है, उसको चिरों से विछड़े हुए प्रभू-कंत मिल जाते हैं। नानक विनती करता है- (गुरू के चरणों में लगी हुई जीव-स्त्री के अंदर) हर वक्त आत्मिक आनंद के बाजे बजते रहते हैं (जिसके सदका वह अपने) मन के अहंकार की मति त्याग देती है साध-संगति में रह के उसकी सुरति मालिक-प्रभू में लगी रहती है, वह जीव-स्त्री मालिक प्रभू की शरण पड़ी रहती है।4।1।



















