🌸*Amritvele da Hukamnama, Sri Darbar Sahib, Sri Amritsar, 24/04/2025*
बिलावलु महला ५ ॥ मात पिता सुत साथि न माइआ ॥ साधसंगि सभु दूखु मिटाइआ ॥१॥ रवि रहिआ प्रभु सभ महि आपे ॥ हरि जपु रसना दुखु न विआपे ॥१॥ रहाउ ॥ तिखा भूख बहु तपति विआपिआ ॥ सीतल भए हरि हरि जसु जापिआ ॥२॥ कोटि जतन संतोखु न पाइआ ॥ मनु त्रिपताना हरि गुण गाइआ ॥३॥ देहु भगति प्रभ अंतरजामी ॥ नानक की बेनंती सुआमी ॥४॥५॥१०॥
अर्थ: हे भाई! माँ, बाप, पुत्र, माया-(इन सब में से कोई भी जीव का सदा के लिए) साथी नहीं बन सकता, (दुःख आने पर भी सहाई नहीं बन सकता)। गुरू की संगत में टिक कर सभी दुःख-कलेश़ दूर कर सकतें हैं ॥१॥ हे भाई! (जो) परमात्मा खुद ही सब जीवों में व्यापक है, उस (के नाम) का जाप जीभ से करता रह, (इस प्रकार) कोई दुःख ज़ोर नहीं पा सकता ॥१॥ रहाउ ॥ हे भाई! जगत माया की तृष्णा, माया की भूख और सड़न में फंसा पड़ा है। जो मनुष्य परमात्मा की सिफ़त-सलाह करते है, (उनके हृदय) ठंडे-ठार हो जाते हैं ॥२॥ हे भाई! करोड़ों यत्न किया भी (माया की तृष्णा से) संतोष प्राप्त नहीं होता। प्रभू की सिफ़त-सलाह के गीत गाया मन संतुष्ट हो जाता है ॥३॥ हे प्रत्येक के दिल की जानने वाले प्रभू! मुझे अपनी भगती का दान दे, हे मालिक! (तेरे दास) नानक की (तेरे दर पर यही) बेनती है ॥४॥५॥१०॥