
Genetic Cancer Risk कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के मन मे क्यो पैदा होता है डर
कैंसर से डरें नहीं, सही समय पर जांच कराएं …
चंडीगढ 28 अक्तूबर, 2026 (विश्ववार्ता) कैंसर का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर पैदा हो जाता है. परिवार में पहले किसी सदस्य को यह बीमारी हो चुकी हो, तो दूसरे सदस्यों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में कैंसर के संभावित वंशानुगत जोखिम को समझना और समय पर विशेषज्ञ की सलाह लेना महत्वपूर्ण हो जाता है।
दरअसल, उत्तर भारत में कैंसर से प्रभावित परिवारों पर किए गए एक अध्ययन में ऐसे संकेत सामने आए हैं, जो इस दिशा में जागरूकता की जरूरत बताते हैं। अध्ययन में 912 मरीजों की जेनेटिक जांच की गई, जिनमें करीब 30 प्रतिशत में कैंसर के बढ़े हुए वंशानुगत जोखिम से जुड़े आनुवंशिक बदलाव पाए गए. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी मरीजों के परिवार के दूसरे सदस्यों को भी कैंसर होगा।
एक हजार परिवारों के मूल्यांकन से मिले अहम संकेत: कैंसर प्रभावित परिवारों पर केंद्रित इस अध्ययन में करीब एक हजार परिवारों का मूल्यांकन किया गया. रिपोर्ट के अनुसार 912 मरीजों की आनुवंशिक जांच में लगभग 30 प्रतिशत मरीजों में ऐसे बदलाव मिले, जिनका संबंध कैंसर के वंशानुगत जोखिम से हो सकता है. ये इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि कैंसर के कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे मामलों में मरीज के इलाज के साथ-साथ उसके परिवार के अन्य सदस्यों के जोखिम का आकलन करने की जरूरत भी सामने आ सकती है।
Genetic Cancer Risk
अध्ययन के आंकड़ों को समझते समय इसकी सीमाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है. यह शोध कैंसर से प्रभावित मरीजों और उनके परिवारों पर आधारित है. इसलिए इसके आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उत्तर भारत के हर तीसरे परिवार में कैंसर होने का खतरा है. करीब 30 प्रतिशत का आंकड़ा जांच किए गए मरीजों में आनुवंशिक बदलावों से संबंधित है, न कि सामान्य आबादी में कैंसर की दर का. इसका मुख्य उद्देश्य उन मरीजों की पहचान करना है, जिनमें आनुवंशिक कारणों से कैंसर का जोखिम बढ़ा हो सकता है और जिन्हें आगे विशेषज्ञ परामर्श की जरूरत पड़ सकती है।
इस बारे में अधिक जानकारी के लिए ईटीवी भारत ने अमृता अस्पताल की गाइनेकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी की प्रोग्राम हेड डॉ. नेहा कुमार और अमृता अस्पताल की स्तन कैंसर विशेषज्ञ डॉ. शिवेता राजदान से खास बातचीत की।
अध्ययन कैंसर के कारणों को समझने में करेंगे मदद: अमृता अस्पताल की गाइनेकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी की प्रोग्राम हेड डॉ. नेहा कुमार ने ईटीवी भारत से बातचीत में बताया कि, “कैंसर से जुड़े जोखिमों को बेहतर ढंग से समझने के लिए इस तरह के अध्ययन समय-समय पर किए जाते हैं. इस तरह के अध्ययन कैंसर से जुड़े जोखिम और बीमारी के कारणों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करते हैं. ऐसे शोध से यह पहचानने में सहायता मिल सकती है कि किन मरीजों में कैंसर के पीछे आनुवंशिक कारणों की भूमिका हो सकती है और किन परिस्थितियों में परिवार के दूसरे सदस्यों की जांच पर विचार करना चाहिए।”
पहले भी हुए हैं अध्ययन: डॉ. नेहा कुमार ने आगे कहा कि, “कैंसर के आनुवंशिक जोखिम को समझने के लिए पहले भी अध्ययन किए जाते रहे हैं. मौजूदा आंकड़े इस विषय पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत को रेखांकित करते हैं. परिवार में कैंसर का इतिहास होने के बावजूद कई लोग संभावित जोखिम की जांच नहीं करवाते. कुछ लोगों को बीमारी का डर रहता है, जबकि कुछ के लिए जांच का खर्च चिंता का विषय बन जाता है. इस वजह से जरूरी जानकारी और विशेषज्ञ की सलाह लेने में देरी हो सकती है. जागरूकता बढ़ाकर लोगों को सही समय पर चिकित्सकीय परामर्श लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
परिवार में कैंसर होने पर सभी को जेनेटिक जांच की जरूरत नहीं: डॉ. नेहा कुमार ने कहा कि, “परिवार में किसी सदस्य को कैंसर होने का मतलब यह नहीं है कि सभी रिश्तेदारों को महंगी जेनेटिक जांच करवानी चाहिए. सबसे पहले परिवार के मेडिकल इतिहास को समझना जरूरी है. परिवार में किस व्यक्ति को कैंसर हुआ, बीमारी किस उम्र में सामने आई और क्या एक से अधिक रिश्तेदार इससे प्रभावित रहे हैं, जैसी जानकारियां जोखिम के आकलन में सहायक हो सकती हैं. इसके बाद विशेषज्ञ तय करते हैं कि जेनेटिक जांच जरूरी है या सामान्य स्क्रीनिंग और नियमित निगरानी पर्याप्त होगी।
स्तन कैंसर विशेषज्ञ डॉ. शिवेता राजदान ने ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान कहा कि, “कुछ आनुवंशिक बदलाव स्तन कैंसर होने की आशंका बढ़ा सकते हैं. इनमें BRCA1 और BRCA2 जीन में होने वाले कुछ हानिकारक बदलाव महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इन जीनों में कुछ खास बदलाव स्तन कैंसर के साथ-साथ अंडाशय के कैंसर का जोखिम भी बढ़ा सकते हैं. हालांकि प्रत्येक आनुवंशिक बदलाव का प्रभाव एक जैसा नहीं होता. इसलिए जांच के परिणामों को विशेषज्ञ की मदद से समझना जरूरी है।
डॉ. शिवेता राजदान ने आगे कहा कि, “यदि परिवार में किसी महिला को कम उम्र में स्तन कैंसर हुआ हो या परिवार की कई पीढ़ियों में स्तन अथवा अंडाशय के कैंसर के मामले सामने आए हों, तो आनुवंशिक जोखिम का आकलन महत्वपूर्ण हो सकता है. ऐसी स्थिति में डॉक्टर परिवार के इतिहास और अन्य चिकित्सकीय जानकारियों के आधार पर जेनेटिक काउंसलिंग या जांच की सलाह दे सकते हैं. इसका उद्देश्य बीमारी का खतरा बढ़ाने वाले संभावित कारणों को समझना और जरूरत के अनुसार निगरानी की योजना तैयार करना है।”
जीन में बदलाव मिलने का अर्थ कैंसर होना तय नहीं: डॉ. शिवेता राजदान ने बताया कि, “आनुवंशिक जांच में कैंसर का जोखिम बढ़ाने वाला बदलाव मिलने पर संबंधित व्यक्ति के रक्त संबंधियों को भी विशेषज्ञ से परामर्श लेने की जरूरत हो सकती है. इससे यह तय करने में मदद मिलती है कि परिवार के किन सदस्यों को जांच या अतिरिक्त निगरानी की आवश्यकता है. लेकिन जीन में ऐसा बदलाव मिलने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति को कैंसर जरूर होगा. इसका अर्थ यह है कि कुछ बदलावों के कारण सामान्य आबादी की तुलना में जोखिम बढ़ सकता है. आगे की जांच, स्क्रीनिंग और निगरानी का फैसला व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर किया जाना चाहिए।
डॉ. नेहा कुमार ने बताया कि, “परिवार में किसी सदस्य को कैंसर हुआ है, तो बीमारी का प्रकार और उसके सामने आने की उम्र जैसी जानकारियां डॉक्टर को बताएं। यह भी स्पष्ट करें कि परिवार में कितने लोग प्रभावित हुए थे और क्या एक ही प्रकार का कैंसर कई रिश्तेदारों में पाया गया है. सही मेडिकल हिस्ट्री मिलने से डॉक्टर जोखिम का बेहतर आकलन कर सकते हैं और जरूरत के अनुसार आगे की जांच की सलाह दे सकते हैं।
डॉक्टरों की मानें तो शरीर में कोई असामान्य बदलाव दिखाई देने पर चिकित्सकीय सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए. स्तन में गांठ या अन्य असामान्य बदलाव होने पर डॉक्टर से जांच करवाना महत्वपूर्ण है. परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर विशेषज्ञ उम्र, बीमारी के प्रकार और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार स्क्रीनिंग की सलाह दे सकते हैं. नियमित जांच का उद्देश्य संभावित बीमारी का समय रहते पता लगाना है. हालांकि, किस व्यक्ति को कौन-सी जांच और कितनी बार करवानी चाहिए, इसका निर्णय चिकित्सकीय सलाह के आधार पर ही होना चाहिए।.
डॉ. शिवेता राजदान ने कहा कि, “आनुवंशिक जांच करवाने से पहले यह जानना जरूरी है कि उसकी आवश्यकता क्यों है और परिणाम से कौन-सी जानकारी मिल सकती है. जांच में हानिकारक बदलाव मिलने, कोई महत्वपूर्ण बदलाव न मिलने या अनिश्चित महत्व का बदलाव मिलने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं. इसलिए रिपोर्ट की व्याख्या विशेषज्ञ से करवानी चाहिए. बिना चिकित्सकीय सलाह के जांच करवाना या रिपोर्ट के आधार पर खुद ही कैंसर का खतरा तय कर लेना उचित नहीं है।
महंगी जांच के डर से न टालें विशेषज्ञ की सलाह: जेनेटिक जांच की लागत कुछ परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है. इसे लेकर : डॉ. शिवेता राजदान ने कहा कि, “प्रत्येक व्यक्ति को यह जांच करवाने की जरूरत नहीं होती. मरीज की बीमारी, परिवार में कैंसर का इतिहास और अन्य जोखिम कारकों को ध्यान में रखकर विशेषज्ञ जांच की उपयोगिता तय करते हैं. इसलिए सबसे पहले डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. यदि जांच जरूरी हो, तो उसकी लागत, उपलब्ध विकल्पों और परिणामों के आधार पर आगे की प्रक्रिया की जानकारी हासिल की जा सकती है।
समय पर पहचान से बेहतर प्रबंधन में मिल सकती है मदद: विशेषज्ञ डॉक्टरों ने कहा कि कैंसर के मामलों में समय पर पहचान, उचित इलाज और नियमित निगरानी महत्वपूर्ण हैं. परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर डर के कारण जांच से बचने के बजाय सही जानकारी हासिल करना ज्यादा उपयोगी है. जोखिम का पता चलने पर कुछ परिवारों में विशेषज्ञ अतिरिक्त स्क्रीनिंग या निगरानी की योजना बना सकते हैं. इससे संभावित बीमारी को समय पर पहचानने और जरूरत पड़ने पर उपचार शुरू करने में मदद मिल सकती है।
अगर परिवार में किसी सदस्य को कैंसर हो चुका है, तो कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है।
परिवार में किस सदस्य को कैंसर हुआ था और बीमारी किस उम्र में सामने आई, इसकी जानकारी डॉक्टर को दें।
अगर परिवार में कम उम्र में स्तन कैंसर या अंडाशय के कैंसर के मामले रहे हैं, तो विशेषज्ञ से परामर्श लें.
डॉक्टर की सलाह के अनुसार जरूरी स्क्रीनिंग और अन्य जांच करवाएं।
शरीर में कोई असामान्य लक्षण दिखाई देने पर उसे नजरअंदाज न करें।
जागरूकता ही जोखिम से निपटने की पहली सीढ़ी: उत्तर भारत के कैंसर प्रभावित परिवारों पर आधारित अध्ययन ने आनुवंशिक जोखिम को समझने और जरूरत के अनुसार जांच कराने के महत्व को सामने रखा है।
डॉ. नेहा कुमार ने कैंसर के कारणों और जोखिमों की पहचान के लिए ऐसे अध्ययनों की उपयोगिता पर जोर दिया, जबकि डॉ. शिवेता राजदान की विशेषज्ञ जानकारी स्तन कैंसर में आनुवंशिक बदलावों की भूमिका को समझने में मदद करती है. दोनों विशेषज्ञों की सलाह का मूल संदेश है कि परिवार में कैंसर होने पर बिना वजह घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इस जानकारी को अनदेखा भी नहीं करना चाहिए. परिवार के मेडिकल इतिहास के आधार पर विशेषज्ञ से सलाह लें, जरूरत के अनुसार जांच करवाएं और नियमित निगरानी रखें. सही जानकारी और समय पर चिकित्सकीय मार्गदर्शन से कैंसर के संभावित जोखिम को बेहतर तरीके से समझने और उसके प्रबंधन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
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