India SIR: चुनाव आयोग द्वारा 12 राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू
SIR और SSR में क्या है अंतर ?
चंडीगढ 16 अक्तूबर, 2026 (विश्ववार्ता) बड़े चुनावों से पहले भारतीय चुनाव आयोग मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए कई विशेष अभियान चलाता है. इनमें दो प्रक्रियाएं काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं। एक है विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SSR) और एक है विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR). बिहार में एसआईआर का पहला चरण पूरा हो चुका है और अब चुनाव आयोग ने 12 राज्यों में यह प्रक्रिया शुरू कर दी है. इसी बीच आइए जानते हैं कि एसएसआर और एसआईआर में क्या अंतर है।
संक्षिप्त पुनरीक्षण का मुख्य ध्यान नए पात्र लोगों को जोड़ने और सामान्य सुधारों पर होता है, जबकि ‘SIR’ कहीं अधिक व्यापक प्रक्रिया है। इसमें पूरे राज्य में घर-घर जाकर सत्यापन करना, प्रविष्टियों की बारीकी से जांच करना और बड़े पैमाने पर डेटा का ऑडिट करना शामिल है। Sir second phase has been started difference between sir and ssr
उदाहरण के लिए, SSR के तहत, अगर कोई मतदाता अपना घर बदलता है, तो उसे अपना पता अपडेट करने के लिए एक फॉर्म भरना पड़ता है। लेकिन SIR में ऐसा नहीं है। एसआईआर के तहत बूथ लेवल ऑफिसर उस पते पर जाते हैं, यह पुष्टि करते हैं कि मतदाता अभी भी वहां रहता है या नहीं, और यह भी देखते हैं कि क्या कोई नया व्यक्ति पात्र हो गया है।
इस तरह, मतदाता के खुद पहल करने का इंतजार करने के बजाय, वे मौके पर जाकर सत्यापन करते हैं और मतदाता सूची को अपडेट कर देते हैं।
SIR को लेकर विवाद
SIR को लेकर ही पूरा विवाद खड़ा हुआ है। विपक्षी दलों ने मतदाताओं के नाम हटाए जाने और पात्र नागरिकों के मतदाता सूची से बाहर रह जाने की संभावना पर चिंता जताई है।
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि इस कवायद का मकसद मतदाता सूचियों को दुरुस्त करना है। इसमें दोहरी या अयोग्य लोगों को हटाया जा रहा है, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि सभी पात्र नागरिक सूची में शामिल रहें।
हालांकि, विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि इस कवायद के कारण असली मतदाता अपना वोट देने का अधिकार खो सकते हैं। उन्होंने दस्तावेजों की जरूरत, सत्यापन की प्रक्रिया और कमजोर वर्गों, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों, पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई है।
यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गया है, जहां कुछ याचिकाओं में इस बात पर सवाल उठाए गए हैं कि यह पुनरीक्षण किस तरह से किया जा रहा है।
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