🌸*Amritvele da Hukamnama, Sri Darbar Sahib, Sri Amritsar, 29/04/2025*
गूजरी महला ४ ॥ होहु दइआल मेरा मनु लावहु हउ अनदिनु राम नामु नित धिआई ॥ सभि सुख सभि गुण सभि निधान हरि जितु जपिऐ दुख भुख सभ लहि जाई ॥१॥ मन मेरे मेरा राम नामु सखा हरि भाई ॥ गुरमति राम नामु जसु गावा अंति बेली दरगह लए छडाई ॥१॥ रहाउ ॥ तूं आपे दाता प्रभु अंतरजामी करि किरपा लोच मेरै मनि लाई ॥ मै मनि तनि लोच लगी हरि सेती प्रभि लोच पूरी सतिगुर सरणाई ॥२॥ माणस जनमु पुंनि करि पाइआ बिनु नावै ध्रिगु ध्रिगु बिरथा जाई ॥ नाम बिना रस कस दुखु खावै मुखु फीका थुक थूक मुखि पाई ॥३॥ जो जन हरि प्रभ हरि हरि सरणा तिन दरगह हरि हरि दे वडिआई ॥ धंनु धंनु साबासि कहै प्रभु जन कउ जन नानक मेलि लए गलि लाई ॥४॥४॥ {पन्ना 493} पद्अर्थ: लावहु = लगाओ, जोड़ो। हउ = मैं। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। धिआई = मैं सिमरता रहूँ। सभि = सारे। निधान = खजाने। जितु जपीअै = जिस का नाम जपने से। लहि जाई = उतर जाती है।1। मन = हे मन! सखा = मित्र। भाई = भ्राता। गावा = मैं गाता हूँ। अंति = आखिरी समय।1। रहाउ। प्रभू = मालिक। अंतरजामी = दिल की जानने वाला। लोच = तमन्ना। मनि = मन में। मै तनि = मेरे हृदय में। सेती = साथ। प्रभि = प्रभू ने।2। पुंनि = पुन्य, भले कर्म, अच्छी किस्मत। ध्रिगु = धिक्कार योग्य। बिरथा = व्यर्थ। रस कस = कई किसम के पदार्थ। मुखि = मुंह पर। थुक पाई = थूकती है, फिटकार डालती है।3। तिन = उनको। दे = देता है। गलि = गले से। लाई = लगा के।4। अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा का नाम मेरा मित्र है मेरा भाई है। मैं गुरू की शिक्षा की बरकति से परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता हूँ। आखिरी वक्त पर परमात्मा का नाम ही मददगार बनता है, प्रभू की हजूरी में नाम ही सुर्खरू करवाता है।1। रहाउ। हे प्रभू! मेरे पर दयावान होवो, मेरा मन (अपने चरणों में) जोड़े रखो, मैं हर समय सदा तेरा ही नाम सिमरता रहूँ। हे मेरे मन! सारे सुख सारे खजाने उस परमात्मा के ही पास हैं, जिसका नाम जपने से सारे दुख (दूर हो जाते हैं), (माया की) सारी भूख उतर जाती है।1। हे हरी! तू खुद ही सब दातें देने वाला है, तू खुद ही (सबका) मालिक है, तू सबके दिल की जानने वाला है। तूने खुद ही मेहर करके मेरे मन में अपनी भक्ति की चाहत पैदा की हुई है। हे भाई! मेरे मन में मेरे हृदय में परमात्मा के साथ मिलाप की चाहत पैदा हुई पड़ी है। परमात्मा ने मुझे सतिगुरू की शरण में ला कर मेरी चाहत पूरी कर दी है।2। हे भाई! मानस जनम बड़ी किस्मत से मिलता है, पर परमात्मा के नाम सिमरन के बिना (मानस जन्म) धिक्कार-योग्य हो जाता है, नाम के बिना व्यर्थ चला जाता है। मनुष्य प्रभू का नाम भुला के दुनिया के अनेकों किस्म के पदार्थ खाता रहता है, दुख ही सहेड़ता है, मुंह से फीके बोल बोलता रहता है, दुनिया इसे धिक्कारें ही डालती है।3। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़े रहते हैं, उनको परमात्मा अपनी हजूरी में आदर मान देता है। हे नानक! परमात्मा अपने सेवक को ‘धन्य धन्य’ कहता है, ‘शाबाश’ कहता है, अपने सेवक को अपने गले से लगा के अपने चरणों में जोड़ लेता है।4।4। Goojaree, Fourth Mehl: