Amritvele da Hukamnama, Sri Darbar Sahib, Sri Amritsar, 15-08-2025
अर्थ :-भ्रम में भुली हुई मैं (परमात्मा को खोजने के लिए) सारा जगत विचरी और ढूंढ ढूंढ के खप गई, (पर इस तरह) वह खसम (भगवान) (हृदय में) शांती नहीं देता, उस के साथ कोई जोर नहीं चल सकता। (पर, हाँ) सतिगुरु की कृपा के साथ भगवान सुमिरा जा सकता है और हृदय के अंदर रखा जा सकता है। हे नानक ! (गुरु की कृपा के साथ) मैंने घर में बैठने से खसम खोज लिया जब करतार ने (मेरे ऊपर) कृपा की (और गुरु मिलाया)।1। जो मनुख अपने मन के पिछे चलता है उस का (सारा) दिन (दुनिया के) धंधों में भटकते हुए बीत जाता है, और रात को वह सौं के गंवा लेता है, (इन धंधों में पड़ा हुआ) झूठ बोल के ज़हर खाता है (भावार्थ, दुनिया के पदार्थ मानता है) और (अंत को यहाँ से) रो के चल पड़ता है; उस के सिर ऊपर मौत का डंडा (तैयार रहता) है, (भावार्थ, हर समय मौत से डरता है), (भगवान को विसार के) ओर में प्यार के कारण (अपनी) इज्ज़त गंवा लेता है; उस ने परमात्मा का नाम तो कभी याद नहीं किया होता (इस लिए) बार बार जन्म मरन का गेड़ (उस को नसीब) होता है। (पर जिस मनुख के) मन में सतिगुरु की कृपा के साथ परमात्मा बसता है उस को कोई मौत का डंडा नहीं लगता (भावार्थ, उस को मौत डरा नहीं सकती) हे नानक ! वह अडोल अवस्था में टिका रहता है (यह अवस्था उस को) परमात्मा की कृपा के साथ मिल जाती है।2।