भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर संयुक्त किसान मोर्चा आज से करेगा देशव्यापी आंदोलन
शुरू होगा लंबा किसान संघर्ष
दिल्ली, 10 अगस्त, 2026 (विश्ववार्ता) भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) सोमवार से अपने बड़े आंदोलन के पहले चरण की शुरुआत करने जा रहा है। इसके तहत देश भर में 1,000 से अधिक स्थानों पर जेल भरो, रेल रोको और सड़क रोको जैसे बड़े प्रदर्शन किए जाएंगे। इस आंदोलन की तैयारियों में पंजाब के भारत-पाकिस्तान सीमावर्ती गांवों के किसान भी बड़ी संख्या में जुटे हैं जो तहसील स्तर पर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेंगे। Skm nationwide farmers protest today to 26 november long agitation
राजन क्षीरसागर ने कहा कि पिछले वर्षों में किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है और केंद्र सरकार की नीतियों ने कृषि संकट को और गहरा किया है। उन्होंने किसानों की संपूर्ण कर्ज़माफी, सभी फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी, चारों लेबर कोड की वापसी, 200 दिन के मनरेगा और 700 रुपये प्रतिदिन मजदूरी, बिजली निजीकरण पर रोक तथा किसान हितैषी नीतियां लागू करने की मांग दोहराई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने 9 दिसंबर 2021 को बिजली विधेयक पर संयुक्त किसान मोर्चा से चर्चा का लिखित आश्वासन दिया था, लेकिन आज तक उस वादे को पूरा नहीं किया।
अवीक साह ने कहा कि अमेरिका के साथ प्रस्तावित FTA भारतीय कृषि पर “साम्राज्यवादी हमला” है। उनके अनुसार, सरकार कृषि, खाद्यान्न भंडारण और कृषि बाज़ार को कॉरपोरेट तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करना चाहती है। उन्होंने कहा कि नई बीज नीति और प्रस्तावित बीज कानून किसानों के पारंपरिक बीजों को खत्म कर कॉरपोरेट कंपनियों का एकाधिकार स्थापित कर रहे हैं, जिससे किसानों की लागत लगातार बढ़ रही है और कृषि संकट गहरा रहा है।
पुरुषोत्तम शर्मा ने आरोप लगाया कि खाद, बीज, कीटनाशक, ट्रैक्टर, कृषि उपकरण और मंडियों तक पर बड़े कॉरपोरेट घरानों का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि कंपनियां किसानों से फसल सस्ते दामों पर खरीदती हैं और उपभोक्ताओं को महंगे दामों पर बेचती हैं। उन्होंने फसल बीमा योजना को किसानों के लिए “छलावा” बताते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज़, बेरोज़गारी और माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के बढ़ते दबाव के कारण किसान और गरीब परिवार गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
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पी. कृष्णप्रसाद ने कहा कि किसान आंदोलन केवल किसानों की आय का सवाल नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा का संघर्ष है। उन्होंने किसानों, खेत मजदूरों, श्रमिकों, युवाओं और अन्य जनसंगठनों से इस आंदोलन को व्यापक बनाने की अपील की।
प्रेस वार्ता में संयुक्त किसान मोर्चा ने अपनी सात प्रमुख मांगें दोहराईं। इनमें सभी मुक्त व्यापार समझौतों का विरोध, सभी फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी, किसानों की संपूर्ण कर्ज़माफी, किसान आत्महत्या प्रभावित परिवारों को 25 लाख रुपये मुआवजा, चारों लेबर कोड की वापसी, 200 दिन का मनरेगा और 700 रुपये दैनिक मजदूरी, बिजली निजीकरण विधेयक, बीज विधेयक और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में संशोधन वापस लेने के साथ-साथ भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा शामिल है।
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