
🪷🌸 Amrit Vele Da Hukamnama Sriहरमंदिर साहिब अमृतसर*
🪷🌸Amrit Vele Da Hukamnama Sri Darbar Sahib Today – 03 August 2026 | Ang 644 आज का हुक्मनामा
सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर की सेवा सफलु है जे को करे चितु लाए ॥ मनि चिंदिआ फलु पावणा हउमै विचहु जाए ॥ बंधन तोड़ै मुकति होइ सचे रहै समाए ॥ इसु जग महि नामु अलभु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ नानक जो गुरु सेवहि आपणा हउ तिन बलिहारै जाउ ॥१॥ मः ३ ॥ मनमुख मंनु अजितु है दूजै लगै जाए ॥ तिस नो सुखु सुपनै नही दुखे दुखि विहाए ॥ घरि घरि पड़ि पड़ि पंडित थके सिध समाधि लगाए ॥ इहु मनु वसि न आवई थके करम कमाए ॥ भेखधारी भेख करि थके अठिसठि तीरथ नाए ॥ मन की सार न जाणनी हउमै भरमि भुलाए ॥ गुर परसादी भउ पइआ वडभागि वसिआ मनि आए ॥ भै पइऐ मनु वसि होआ हउमै सबदि जलाए ॥ सचि रते से निरमले जोती जोति मिलाए ॥ सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाइआ नानक सुखि समाए ॥२॥ पउड़ी ॥ एह भूपति राणे रंग दिन चारि सुहावणा ॥ एहु माइआ रंगु कसुम्भ खिन महि लहि जावणा ॥ चलदिआ नालि न चलै सिरि पाप लै जावणा ॥ जां पकड़ि चलाइआ कालि तां खरा डरावणा ॥ ओह वेला हथि न आवै फिरि पछुतावणा ॥६॥ Amrit Vele Da Hukamnama Sri Darbar Sahib Today – 03 August 2026 | Ang 644
अर्थ: जो कोई मनुष्य चिक्त लगा के सेवा करे, तो सतिगुरू की (बताई) सेवा जरूर फल लाती है; मन-इच्छित फल मिलता है, अहंकार मन में से दूर होता है; (गुरू की बताई हुई कार माया के) बँधनों को तोड़ती है (बँधनों से) खलासी हो जाती है और सच्चे हरी में मनुष्य समाया रहता है।इस संसार में हरी का नाम दुर्लभ है, सतिगुरू के सन्मुख मनुष्य के मन में आ के बसता है; हे नानक! (कह–) मैं सदके हूँ उनसे जो अपने सतिगुरू की बताई हुई कार करते हैं।1। मनमुख का मन उसके काबू से बाहर है, क्योंकि वह माया में जा लगा है; (नतीजा ये कि) उसे सपने में भी सुख नहीं मिलता, (उसकी उम्र) सदा दुख में ही गुजरती है। अनेकों पंडित लोग पढ़-पढ़ के और सिद्ध समाधियां लगा-लगा के थक गए है, कई कर्म करके थक गए हैं; (पढ़ने से और समाधियों से) ये मन काबू नहीं आता।
भेख करने वाले मनुष्य (भाव, साधू लोग) कई भेष करके और अढ़सठ तीर्थों पर नहा के थक गए हैं; अहंकार व भ्रम में भूले हुओं को मन की सार नहीं आई। बड़े भाग्यों से सतिगुरू की कृपा से भउ उपजता है और मन में आ के बसता है; (हरी का) भय उपजते ही, और अहंकार सतिगुरू के शबद से जला के मन वश में आता है। जो मनुष्य ज्योति रूपी प्रभू में अपनी बिरती मिला के सच्चे में रंगे गए हैं, वे निर्मल हो गए हैं; (पर) हे नानक! सतिगुरू के मिलने से ही नाम मिलता है और सुख में समाई होती है।
2। राजाओं और रानियों के ये रंग चार दिनों (अर्थात, थोड़े समय) तक ही शोभायमान रहते हैं; माया का ये रंग कुसंभ का रंग है (भाव, कुसंभ की तरह छण-भंगुर है), छिन-मात्र में उतर जाएगा, (संसार से) चलने के वक्त माया साथ नहीं जाती, (पर इसके कारण किए) पाप अपने सिर ले लिए जाते हैं। जब जम-काल ने पकड़ के आगे लगा लिया, तो (जीव) बहुत भय-भीत होता है; (मनुष्य-जन्म वाला) वह समय फिर नहीं मिलता, इसलिए पछताता है।6।



















