रिकवरी से नौकरी तक: Bhagwant Mann government का ‘‘War on Drugs’ Campaign नशे के आदी लोगों को नौकरी देकर वापस पटरी पर ला रहा है
पंजाब के ‘वॉर ऑन ड्रग्स’ कैंपेन की नई पहचान: नौकरी, सम्मान और उम्मीद की प्रेरणा देने वाली कहानियाँ
चंडीगढ, 16 जून, 2026 (विश्ववार्ता) – पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की लीडरशिप में ‘वॉर ऑन ड्रग्स’ कैंपेन अब नौकरी के मौकों के ज़रिए नशे के आदी लोगों की ज़िंदगी में रिकवरी और नई उम्मीद की प्रेरणा देने वाली कहानियों से पहचाना जा रहा है। जो लोग कभी नशे की गिरफ़्त से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहे थे, वे आज होटल, रेस्टोरेंट, शॉपिंग मॉल, डी-मार्ट, ब्लिंकिट जैसी जगहों पर काम कर रहे हैं या सेल्फ़-एम्प्लॉयमेंट के ज़रिए अपनी ज़िंदगी को वापस पटरी पर ला रहे हैं।
मार्च 2025 में राज्य में शुरू हुए ‘वॉर ऑन ड्रग्स’ कैंपेन के बाद, पंजाब के अलग-अलग नशा मुक्ति और रिहैबिलिटेशन सेंटर में अपना इलाज पूरा करने वाले कई लोगों को नौकरी मिली है। यह इस बात का सबूत है कि नौकरी के मौके नशा-मुक्त ज़िंदगी जीने में अहम भूमिका निभाते हैं। War on Drugs’ Campaign
उनमें से एक हैं दलजिंदर सिंह (नाम बदला हुआ), जिन्होंने फरवरी 2026 में डी-मार्ट में नौकरी शुरू की। उन्होंने नौकरी से जुड़ी ज़िम्मेदारियों को पॉज़िटिव तरीके से अपनाया है और धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी फिर से बना रहे हैं। दलजिंदर कहते हैं, “नौकरी मिलने से मुझे हर सुबह उठने का एक मकसद मिला है। इससे मेरा सेल्फ़-कॉन्फ़िडेंस बढ़ा है। अब ज़िंदगी अच्छी लगती है… सुबह की एक कप चाय भी मेरे चेहरे पर मुस्कान ला देती है।”
प्रवीण ढल्ल, जो किराने का सामान, फल, सब्ज़ी और रोज़ाना की दूसरी ज़रूरतों की डिलीवरी सर्विस से जुड़े हैं, कहते हैं, “रिहैबिलिटेशन ने मुझे ज़िंदा रखा, लेकिन नौकरी ने मुझे फिर से जीना सिखाया। जब मैंने कमाना शुरू किया, तो मैंने खुद को सिर्फ़ ड्रग्स छोड़ने की कोशिश करने वाले के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे इंसान के तौर पर देखना शुरू किया जिस पर ज़िम्मेदारियाँ थीं और जो भविष्य के बारे में सोच रहा था। इस एहसास ने मुझे ड्रग्स से दूर रहने की ताकत दी।”
‘वॉर ऑन ड्रग्स’ कैंपेन सिर्फ़ रिहैबिलिटेशन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसके बाद भी लोगों को सपोर्ट करता रहता है। इसका एक उदाहरण जालंधर डी-एडिक्शन सेंटर में देखा जा सकता है, जहाँ पुराने ड्रग एडिक्ट जो मेनस्ट्रीम में लौट आए हैं, उनकी रेगुलर मॉनिटरिंग की जाती है ताकि उनकी प्रोग्रेस का पता लगाया जा सके और दोबारा लत लगने के किसी भी संकेत का पता लगाया जा सके।
फॉलो-अप के दौरान, यह पता चला कि ठीक हो चुके कई लोग नौकरी करने लगे हैं, जो उनके परिवार और आर्थिक जीवन में फिर से जुड़ने की दिशा में एक ज़रूरी कदम है। जैसे-जैसे ज़्यादा से ज़्यादा बेनिफिशियरी ट्रीटमेंट सेंटर से बाहर निकलकर नौकरी और सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट में आ रहे हैं, मुख्यमंत्री भगवंत मान के ‘ड्रग्स के खिलाफ जंग’ कैंपेन का असर अब सिर्फ़ गिरफ्तारियों और ड्रग ज़ब्ती से ही नहीं, बल्कि ज़िंदगी को फिर से बनाने और नौकरी के नए मौकों से भी आंका जा रहा है। Bhagwant Mann government
काउंसलर, जो ड्रग एडिक्ट को इस दलदल से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाते हैं, उनका मानना है कि ट्रीटमेंट से नौकरी तक का सफ़र सफल रिहैबिलिटेशन के सबसे मज़बूत इंडिकेटर में से एक है।
“रिकवरी का मतलब सिर्फ़ ड्रग्स छोड़ना नहीं है। हम मरीज़ों को अपनी भावनाएँ बताने, अपनी ज़िंदगी को फिर से ठीक करने और भविष्य के लिए लक्ष्य तय करने के लिए मोटिवेट करते हैं। जब उन्हें नौकरी और एक स्थिर ज़िंदगी का रास्ता दिखता है, तो वे ड्रग-फ्री रहने के लिए और भी ज़्यादा कमिटेड हो जाते हैं।”
‘वॉर ऑन ड्रग्स’ के तहत जालंधर डी-एडिक्शन सेंटर के नोडल साइकेट्रिस्ट डॉ. अभय राज सिंह ने कहा, “ऐसी सक्सेस स्टोरीज़ दिखाती हैं कि ड्रग ट्रीटमेंट को रिहैबिलिटेशन और एम्प्लॉयमेंट सपोर्ट के साथ जोड़ना कितना ज़रूरी है। हर वो इंसान जो काम पर लौटता है, वह न सिर्फ़ अपनी पर्सनल जीत की निशानी है, बल्कि एक मज़बूत परिवार और एक सुरक्षित समाज की भी निशानी है।”
जैसे-जैसे ज़्यादा से ज़्यादा बेनिफिशियरी ट्रीटमेंट सेंटर्स में ट्रीटमेंट लेने के बाद एम्प्लॉयमेंट और सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट की ओर बढ़ रहे हैं, इस कैंपेन का असर अब सिर्फ़ अरेस्ट और रिकवरी में ही नहीं, बल्कि लोगों को एक नई ज़िंदगी, नए एम्प्लॉयमेंट के मौके और एक बेहतर भविष्य मिलने में भी देखा जा रहा है।
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